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खम्मा घणी सा — पधारो म्हारे ठिकाने
ठिकाना ढाबला घोसी का शाही चिह्न — बड़गुजर राजपूत प्रतीक

सूर्यवंशी · बड़गुजर · सिसोदिया · रजोरा · 16वीं शताब्दी से

ठिकाना ढाबला घोसी

॥ राघवाय नमः — जय माँ आसावरी ॥

मालवा में बड़गुजर राजपूतों का शाही ठिकाना — भगवान श्री राम के पुत्र लव के वंशज — मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले के ढाबला घोसी में स्थित एक जीवंत सूर्यवंशी क्षत्रिय परंपरा। उज्जैन, इंदौर, भोपाल और आशावरी माता जी के पावन आशीर्वाद से जुड़ा हुआ।

हमारी वंश परंपरा

अयोध्या से मालवा तक

ठिकाना ढाबला घोसी में आपका स्वागत है। हम एक गौरवशाली सूर्यवंशी क्षत्रिय वंश हैं, जो भगवान श्री राम के बड़े पुत्र लव के वंशज हैं। सदियों तक बड़गुजर राजवंश ने राजस्थान और पश्चिमी भारत के कई राज्यों पर शासन किया। अलवर और राजोरगढ़ हमारी विरासत के प्रमुख केंद्र रहे हैं।

हम मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक बड़गुजर ठिकाना ढाबला घोसी का प्रतिनिधित्व करते हैं। बड़गुजर भारत के सबसे सम्मानित क्षत्रिय योद्धा वंशों में से एक हैं। हमारे पूर्वज अपनी अदम्य वीरता, बुद्धिमान नेतृत्व और धर्म के प्रति अटूट समर्पण के लिए प्रसिद्ध थे — यही गुण आज भी हमारे परिवार की पहचान हैं।

सिसोदिया और रजोरा शाखाएं हमारी वंशावली में जुड़ी हुई हैं, जो इस ठिकाने को राजपूताने की महान परंपरा से जोड़ती हैं। सन् 1947 में देश की आज़ादी के बाद जब रियासतें समाप्त हुईं, तब भी बड़गुजर विरासत जीवित रही — हमारे रीति-रिवाज़ों, स्मृतियों और ढाबला घोसी की धरोहर में। आशावरी माता जी के आशीर्वाद से हम पाँच सौ वर्षों से भी अधिक समय से अपनी परंपराओं को निभाते आ रहे हैं।

हम किन मूल्यों को आगे बढ़ाते हैं

ठिकाने के तीन स्तंभ

०१

वंश — परंपरा

अयोध्या के लव से लेकर अलवर और राजोरगढ़ के सूर्यवंशी बड़गुजर शासकों तक, और आज ढाबला घोसी तक — एक अटूट वंश श्रृंखला। सिसोदिया और रजोरा की रक्तरेखाएं इसी घराने में मिलती हैं।

०२

शौर्य — वीरता

राजपूताने में हिंदू संप्रभुता की रक्षा में गढ़ी गई एक योद्धा परंपरा। हर वंशज को केवल युद्धों की कहानियाँ ही नहीं, बल्कि साहस, सम्मान और दुर्बलों की रक्षा की अपेक्षा भी विरासत में मिलती है — यही सच्चा क्षत्रिय धर्म है।

०३

परंपरा — रीति

आशावरी माता जी की भक्ति, त्योहार, रस्में और रिवाज़ आज भी ढाबला घोसी में जीवित हैं। बन्ना-बाईसा लोकगीतों की गूँज से लेकर पवित्र झरोखा दर्शन तक — संस्कृति को केवल याद नहीं किया जाता, जिया जाता है।

संक्षिप्त इतिहास

ठिकाने की प्रमुख घटनाएं

पौराणिक काल

अयोध्या के लव से वंश

बड़गुजर वंश अपनी सूर्यवंशी उत्पत्ति भगवान श्री राम के बड़े पुत्र लव से मानता है, जो अयोध्या के शासक थे। यह भारत की सबसे प्राचीन क्षत्रिय परंपराओं में से एक है।

मध्यकालीन राजपूताना

बड़गुजर राजवंश का उदय

बड़गुजर राजस्थान और पश्चिमी भारत में शक्तिशाली रियासतों के शासक बने। अलवर और राजोरगढ़ बड़गुजर शक्ति के प्रमुख केंद्र बन गए, जहाँ से योद्धा, प्रशासक और कला संरक्षक उभरे।

16वीं शताब्दी

ढाबला घोसी की स्थापना

बड़गुजर वंश की एक शाखा ने मालवा क्षेत्र में ढाबला घोसी में अपना ठिकाना स्थापित किया — जो आज मध्य प्रदेश का शाजापुर जिला है। यह मध्य भारत में राजपूत शासन और संस्कृति का एक नया केंद्र बना।

1947 और उसके बाद

स्वतंत्रता और निरंतरता

भारत की स्वतंत्रता के साथ रियासतों का अंत हुआ, लेकिन ढाबला घोसी का बड़गुजर परिवार आज भी अपनी पवित्र परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और पैतृक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए संजोए हुए है।

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"वीरता, नेतृत्व और धर्म के प्रति अटूट समर्पण — यही वे गुण हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी हमारी पहचान बने रहे। हम बड़गुजर अग्नि के रक्षक हैं।"

॥ जय माँ आसावरी — राघवाय नमः ॥

ठिकाने की झलकियाँ

परिवार और विरासत की तस्वीरें

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